Sep 21, 2026 Login

गूगल को यूजर्स का लोकेशन डेटा ट्रैक करना पड़ा भारी, यूरोपीय संघ ने ठोका 4400 करोड़ का जुर्माना

Tracking users' location data cost Google dearly; the European Union imposed a fine of ₹4,400 crore.

नई दिल्ली। स्मार्ट फोन और डिजिटल दुनिया में हमारी एक-एक गतिविधि पर नजर रखने वाली टेक दिग्गज कंपनी गूगल को प्राइवेसी नियमों की अनदेखी करना बेहद भारी पड़ गया है। यूजर्स का लोकेशन डेटा गैर-कानूनी और अपारदर्शी तरीके से ट्रैक करने के जुर्म में यूरोपीय संघ के डेटा प्राइवेसी नियामक ने गूगल पर 403 मिलियन यूरो यानी लगभग 4,432 करोड़ रुपये का भारी-भरकम जुर्माना लगाया है।

स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। हम क्या सर्च करते हैं, किन वेबसाइटों पर जाते हैं, कौन-सी ऐप इस्तेमाल करते हैं और दिनभर में कहां-कहां जाते हैं इन तमाम डिजिटल गतिविधियों का बड़ा हिस्सा तकनीकी कंपनियों तक पहुंचता है। इसी डेटा की गोपनीयता को लेकर दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियों में शामिल गूगल पर यूरोपीय संघ ने करीब 403 मिलियन यूरो यानी लगभग 4,400 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाया है। यह कार्रवाई यूजर्स के लोकेशन डेटा को लेकर की गई है और इसे यूरोप में डिजिटल प्राइवेसी के सख्त होते नियमों का बड़ा संकेत माना जा रहा है। मामला आयरलैंड की राजधानी डबलिन से सामने आया है। यूरोपीय संघ के 27 देशों में गूगल का यूरोपीय मुख्यालय आयरलैंड में होने के कारण वहां की डेटा प्राइवेसी एजेंसी ने इस मामले की जांच की। करीब छह साल पहले शुरू हुई जांच में यह देखा गया कि गूगल ने यूरोपीय संघ के सख्त जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन के तहत यूजर्स के लोकेशन डेटा को किस तरह एकत्र और इस्तेमाल किया। जांच के दौरान मुख्य रूप से वेब एंड ऐप एक्टिविटी, लोकेशन हिस्ट्री और एंड्रॉयड के लोकेशन एक्यूरेसी फीचर को जांच के दायरे में रखा गया। नियामक का कहना है कि इन सेवाओं के माध्यम से लोकेशन से जुड़े डेटा के इस्तेमाल और उसके प्रबंधन का तरीका उस समय लागू प्राइवेसी नियमों के अनुरूप नहीं था। लोकेशन डेटा देखने में सामान्य जानकारी लग सकती है, लेकिन इसके जरिए किसी व्यक्ति की रोजमर्रा की गतिविधियों का विस्तृत अंदाजा लगाया जा सकता है। कोई व्यक्ति किस इलाके में रहता है, कहां काम करता है, किन स्थानों पर जाता है और उसकी दिनचर्या कैसी है इन सबका अनुमान लोकेशन रिकॉर्ड से लगाया जा सकता है। यही वजह है कि यूरोपीय नियामक ने लोकेशन डेटा को केवल तकनीकी जानकारी नहीं, बल्कि व्यक्ति की निजी जिंदगी से जुड़ा संवेदनशील डेटा माना है। नियामक के मुताबिक, लोकेशन संबंधी जानकारी डिजिटल सेवाओं को बेहतर बनाने में उपयोगी हो सकती है, लेकिन इसके इस्तेमाल में पारदर्शिता और यूजर की सहमति बेहद महत्वपूर्ण है। उपभोक्ता को यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि उसका डेटा किस उद्देश्य से लिया जा रहा है और उसे किस तरह इस्तेमाल किया जाएगा। भारी जुर्माने के बाद गूगल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि मामला कंपनी की पुरानी नीतियों से जुड़ा है। कंपनी के अनुसार, 2019 के बाद से उसकी नीतियों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं और यूजर्स को अपनी लोकेशन संबंधी जानकारी को नियंत्रित तथा मैनेज करने के लिए पहले की तुलना में आसान विकल्प उपलब्ध कराए गए हैं। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ डेटा प्राइवेसी अब केवल तकनीकी विषय नहीं रह गई है। यूरोपीय संघ लगातार यह संदेश दे रहा है कि बड़ी टेक कंपनियां करोड़ों यूजर्स का डेटा जुटाते समय नियमों और पारदर्शिता की अनदेखी नहीं कर सकतीं। गूगल पर लगाया गया यह जुर्माना यूरोप में किसी टेक कंपनी पर लगाया गया चौथा सबसे बड़ा प्राइवेसी जुर्माना बताया जा रहा है। इससे पहले मेटा और टिकटॉक जैसी बड़ी टेक कंपनियां भी डेटा प्राइवेसी से जुड़े मामलों में कार्रवाई का सामना कर चुकी हैं। मेटा पर इससे पहले 1.2 अरब यूरो का भारी जुर्माना लगाया जा चुका है। खास बात यह है कि आयरलैंड का नियामक गूगल से जुड़े तीन अन्य मामलों की भी जांच कर रहा है। ऐसे में टेक कंपनियों के लिए यह मामला केवल एक बड़े आर्थिक दंड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डिजिटल युग में यूजर की निजता, डेटा पर नियंत्रण और कंपनियों की जवाबदेही को लेकर बढ़ती सख्ती का संकेत भी है। आज जब स्मार्टफोन हमारी जेब में मौजूद एक डिजिटल पहचान बन चुका है, तब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि तकनीकी कंपनियां हमारा डेटा कितना जमा करती हैं। बड़ा सवाल यह है कि यूजर को अपने ही डेटा पर कितना नियंत्रण हासिल है और उसे यह जानकारी कितनी स्पष्टता से दी जाती है। गूगल पर हुई यह कार्रवाई इसी बहस को फिर केंद्र में ले आई है।