तेलंगाना हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: बार एसोसिएशन की सदस्यता वकीलों के लिए अनिवार्य नहीं

Significant verdict by Telangana High Court: Bar Association membership not mandatory for lawyers.

नई दिल्ली। तेलंगाना हाईकोर्ट की जस्टिस एन. तुकारामजी की एकल पीठ ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी अधिवक्ता के लिए बार एसोसिएशन की सदस्यता लेना अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। केवल सदस्यता न लेने के आधार पर किसी वकील को कानून की प्रैक्टिस करने से रोका नहीं जा सकता और न ही उसे अयोग्य ठहराया जा सकता। यह फैसला Vijay Gopal v. Bar Council of India & Anr. मामले में सुनाया गया।

अदालत ने Bar Council of India Certificate and Place of Practice (Verification) Rules, 2015 के नियम 6 की सीमित व्याख्या करते हुए कहा कि इस प्रावधान को इस तरह लागू नहीं किया जा सकता कि बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य हो जाए या वकीलों के पेशेवर अधिकारों पर गैर-वैधानिक संस्थाओं का नियंत्रण स्थापित हो। कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्याख्या Advocates Act, 1961 की सीमा से परे होगी और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) तथा 19(1)(g) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानी जाएगी।

यह मामला अधिवक्ता विजय गोपाल द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें नियम 6 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि Advocates Act, 1961 की धाराओं 22, 30 और 33 के तहत प्राप्त वकालत के वैधानिक अधिकार को किसी बार एसोसिएशन की सदस्यता से नहीं जोड़ा जा सकता। साथ ही, किसी संगठन की सदस्यता के लिए बाध्य करना संविधान द्वारा प्रदत्त संघ बनाने या न बनाने की स्वतंत्रता का भी अतिक्रमण है।

सुनवाई के दौरान बार काउंसिल ऑफ इंडिया और तेलंगाना बार काउंसिल ने दलील दी कि नियम 6 का उद्देश्य सक्रिय अधिवक्ताओं की पहचान करना और उन्हें कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उपलब्ध कराना है। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि नियम 6 केवल एक विकल्प प्रदान करता है, इसे अनिवार्य सदस्यता के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशनों को वकीलों के प्रैक्टिस करने के अधिकार पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई नियामक नियंत्रण नहीं दिया जा सकता।

अंततः हाईकोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया कि वह सभी राज्य बार काउंसिलों को आवश्यक स्पष्टीकरण जारी करे, ताकि प्रमाणन और सत्यापन की प्रक्रिया केवल प्रशासनिक एवं कल्याणकारी उद्देश्यों तक सीमित रहे और इसे वकालत के अधिकार पर बाध्यकारी शर्त के रूप में लागू न किया जाए।