उत्तराखंड की राह पर छत्तीसगढ़: मदरसा बोर्ड की जगह लागू होगा 'अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण',धामी सरकार ने भेजा ड्राफ्ट
देहरादून। शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार और देश में 'वन नेशन, वन एजुकेशन' (एक देश, एक शिक्षा) की अवधारणा को धरातल पर उतारने की दिशा में उत्तराखंड मॉडल अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ रहा है। समान नागरिक संहिता लागू कर देश में मिसाल पेश करने के बाद अब देवभूमि का नया 'अल्पसंख्यक शिक्षा मॉडल' दूसरे राज्यों को खूब पसंद आ रहा है। उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड को समाप्त कर गठित किए गए 'अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण' के सफल प्रयोग को अब छत्तीसगढ़ सरकार भी अपने राज्य में लागू करने की तैयारी में है। छत्तीसगढ़ सरकार के अल्पसंख्यक विभाग की आधिकारिक मांग पर उत्तराखंड शासन ने इस नए कानून का पूरा ड्राफ्ट रायपुर भेज दिया है। उत्तराखंड में 1 जुलाई से मदरसा बोर्ड को भंग कर नए अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की व्यवस्था को लागू करने की प्रक्रिया विधिवत रूप से शुरू की जा चुकी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार लंबे समय से इस ऐतिहासिक बदलाव के ब्लूप्रिंट पर काम कर रही थी। सरकार का साफ दावा है कि इस क्रांतिकारी पहल का उद्देश्य किसी भी समुदाय की धार्मिक या पारंपरिक शिक्षा को कमजोर करना या रोकना नहीं है, बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र-छात्राओं को आधुनिक और मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ना है। नए ढांचे के तहत विद्यार्थियों को धार्मिक विषयों के साथ-साथ विज्ञान, गणित, कंप्यूटर, अंग्रेजी और रोजगारपरक कौशल की शिक्षा दी जाएगी, ताकि वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में मुख्यधारा के युवाओं से पीछे न छूटें।
उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए इसे राज्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया है। उन्होंने कहा मदरसा बोर्ड को समाप्त कर 'अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण' की स्थापना का हमारा निर्णय अब राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श का मुख्य केंद्र बन चुका है। छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के चेयरमैन सलीम राज सिद्दीकी से मेरी इस विषय पर विस्तृत और सकारात्मक चर्चा हुई है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री स्तर पर भी इस मॉडल को लेकर भारी उत्सुकता और रुचि दिखाई गई है। इसी के बाद वहां के अल्पसंख्यक विभाग ने हमसे कानून का ड्राफ्ट मांगा था, जिसे हमने ससम्मान उपलब्ध करा दिया है। शादाब शम्स ने आगे बताया कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ सरकार के आला अधिकारी और विधि विशेषज्ञ उत्तराखंड के इस कानून के विभिन्न प्रावधानों और बारीकियों का गहन अध्ययन व समीक्षा कर रहे हैं। यदि सब कुछ तय रणनीति के अनुसार रहा, तो छत्तीसगढ़ जल्द ही इस मॉडल को अपनाने वाला देश का अगला राज्य बन सकता है। यह पहली बार नहीं है जब उत्तराखंड की किसी नीति का अनुकरण अन्य राज्य कर रहे हैं। इससे पहले देश का पहला राज्य बनते हुए उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता को पारित किया था, जिसके बाद गुजरात, महाराष्ट्र और असम जैसे बड़े राज्यों ने भी रुचि दिखाते हुए उत्तराखंड के यूसीसी ड्राफ्ट का अध्ययन शुरू किया था। अब शिक्षा के क्षेत्र में भी उत्तराखंड अन्य राज्यों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका में सामने आ रहा है। उत्तराखंड सरकार की इस पहल को लेकर देश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में भी बहस छिड़ गई है। शिक्षाविदों और सरकार के समर्थकों का मानना है कि यह कदम अल्पसंख्यक समाज के बच्चों को गरीबी और पिछड़ेपन के चक्रव्यूह से निकालकर आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर और इंजीनियर बनने के समान अवसर प्रदान करेगा। वहीं, कुछ पारंपरिक संगठनों ने इस बदलाव पर अपनी वैचारिक आपत्तियां भी दर्ज कराई हैं। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कदम पूरी तरह से छात्रों के उज्जवल भविष्य और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार को समर्पित है। छत्तीसगढ़ द्वारा इस कानून के ड्राफ्ट को मंगाए जाने के बाद यह तय हो गया है कि आने वाले दिनों में देश के कई अन्य राज्य भी मदरसा शिक्षा में सुधार के लिए उत्तराखंड के इस 'अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण' मॉडल की तरफ रुख कर सकते हैं। धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान, गणित और कंप्यूटर को अनिवार्य रूप से जोड़ना। मुख्यधारा के स्कूलों की तरह अल्पसंख्यक संस्थानों के छात्रों को भी समान शैक्षणिक और ढांचागत सुविधाएं प्रदान करना। प्राधिकरण के तहत मिलने वाली डिग्रियों और प्रमाणपत्रों को व्यापक मान्यता देना ताकि सरकारी नौकरियों में छात्रों को प्राथमिकता मिल सके।