क्या नई सरकार पुराने मनोनीत सभासदों को हटा सकती है?क्या कहते हैं संविधान, अधिनियम और कोर्ट के फैसले?जानिए उत्तराखंड में क्या कहता है कानून?
उत्तराखंड में स्थानीय निकायों में सरकार द्वारा मनोनीत सभासदों को लेकर समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि यदि राज्य में सरकार बदल जाए, तो क्या पुराने मनोनीत सभासद अपने पद पर बने रहते हैं या नई सरकार उन्हें हटाकर नए लोगों को नियुक्त कर सकती है। इस संबंध में भारतीय संविधान, उत्तराखंड में लागू नगरपालिका कानून और न्यायालयों के फैसले स्थिति को काफी हद तक स्पष्ट करते हैं।
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243R के तहत राज्यों को यह अधिकार दिया गया है कि वे नगर पालिका और नगर निगम में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले व्यक्तियों को मनोनीत कर सकते हैं। हालांकि संविधान यह भी स्पष्ट करता है कि ऐसे मनोनीत सदस्यों को सामान्य मामलों में मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होता।
उत्तराखंड में कौन सा कानून लागू है?
उत्तराखंड राज्य में नगर पालिकाओं और नगर निगमों के संचालन के लिए मूल रूप से उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1916 तथा उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 संशोधनों सहित लागू हैं।
नगर पालिका अधिनियम की धारा 9 के तहत राज्य सरकार को मनोनीत सदस्य नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है।
नगर पालिका या नगर निगम का सामान्य कार्यकाल संविधान के अनुच्छेद 243U के अनुसार अधिकतम पांच वर्ष होता है। सामान्य परिस्थितियों में मनोनीत सदस्य भी उसी बोर्ड के कार्यकाल तक बने रह सकते हैं।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान लागू होता है।
"Pleasure of the State Government" का क्या मतलब है?
नगर पालिका अधिनियम की धारा 9 में स्पष्ट प्रावधान है कि सरकार द्वारा मनोनीत सदस्य "During the Pleasure of the State Government" अर्थात राज्य सरकार के प्रसादपर्यंत पद पर बने रहेंगे।
सरल शब्दों में इसका अर्थ यह है कि मनोनीत सभासद का पद निर्वाचित प्रतिनिधि की तरह पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं होता। यदि राज्य सरकार उचित समझे तो वह उनका मनोनयन समाप्त कर सकती है और उनकी जगह नए मनोनीत सदस्य नियुक्त कर सकती है।
क्या सरकार बदलते ही पद स्वतः समाप्त हो जाता है?
नहीं।
सरकार बदलने मात्र से मनोनीत सभासद का कार्यकाल स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। इसके लिए राज्य सरकार को अलग से आदेश जारी करना होता है।
हालांकि यदि नई सरकार चाहे तो कानून में दिए गए अधिकारों का प्रयोग करते हुए पुराने मनोनीत सभासदों का मनोनयन समाप्त कर नए सदस्यों की नियुक्ति कर सकती है।
क्या सरकार बिना कारण भी हटा सकती है?
चूंकि मनोनीत सदस्य "Pleasure of the Government" के सिद्धांत के तहत नियुक्त होते हैं, इसलिए सरकार को उन्हें हटाने का अधिकार प्राप्त है। हालांकि यदि किसी आदेश को मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या कानून के विपरीत माना जाता है तो उसे हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
मतदान का अधिकार क्यों नहीं?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243R(2) के अनुसार विशेष ज्ञान या अनुभव के आधार पर मनोनीत सदस्यों को मतदान का अधिकार नहीं दिया गया है। वे बैठकों में भाग ले सकते हैं, अपनी राय रख सकते हैं, लेकिन निर्वाचित सदस्यों की तरह मतदान नहीं कर सकते।
इस विषय पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी अपने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया था कि मनोनीत सदस्यों को मतदान का अधिकार देना संविधान की मंशा के अनुरूप नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने Om Narain Agarwal बनाम Nagar Palika, Shahjahanpur (1993) मामले में कहा था कि यदि किसी कानून में मनोनीत सदस्य को "Pleasure of the Government" के आधार पर नियुक्त किया गया है, तो सरकार को उसका मनोनयन समाप्त करने का अधिकार है। यह निर्वाचित पद नहीं बल्कि मनोनयन का पद है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में सरकार द्वारा मनोनीत सभासदों का कार्यकाल सामान्य रूप से नगर निकाय के पांच वर्षीय कार्यकाल से जुड़ा होता है, लेकिन उनका पद पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं माना जाता। सरकार बदलने से उनका पद स्वतः समाप्त नहीं होता, लेकिन नई राज्य सरकार कानून के तहत आदेश जारी कर पुराने मनोनीत सभासदों को हटाकर नए सदस्यों का मनोनयन कर सकती है। यही कारण है कि मनोनीत सभासदों का पद राज्य सरकार के "Pleasure Doctrine" यानी प्रसादपर्यंत सिद्धांत के अधीन माना जाता है।