असम विधानसभा चुनाव: विरासत से योग्यता की ओर,सियासत की नई लहर,असम चुनाव में जेन जी का उभार
गुवाहाटी। राजनीति अब पारंपरिक विरासत और सियासी परिवारों से आगे निकलकर योग्यता, शिक्षा, छात्र आंदोलनों और जमीनी जुड़ाव की ओर बढ़ रही है। असम की 126 सीटों वाली विधानसभा चुनाव में यह बदलाव साफ दिख रहा है। जहां छह लाख से अधिक युवा मतदाता पहली बार वोट डालने जा रहे हैं, वहीं राजनीतिक दलों ने 34 वर्ष तक के युवाओं को बड़ी संख्या में टिकट दिए हैं। यह महज युवा चेहरों की मौजूदगी नहीं, बल्कि जेन-जी और नए दौर के नेतृत्व का उभार है। 9 अप्रैल 2026 को एक चरण में होने वाले चुनाव में पार्टियां अब जीत के लिए नए चेहरों और नई ऊर्जा पर दांव लगा रही हैं। ये उम्मीदवार सियासी परिवारों से नहीं आ रहे हैं। न कोई बड़े नेता के बेटे-बेटी हैं, न पारंपरिक सत्ता ढांचे का हिस्सा। वे छात्र राजनीति, सामाजिक कार्य, पेशेवर अनुभव और आंदोलनों के दम पर मैदान में उतरे हैं। बदलाव सिर्फ उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि सोच का भी है।
चाय बागान से उठी बेरोजगारी की आवाज
राइजोर दल से मार्गेरिटा सीट से प्रत्याशी राहुल छेत्री (31 वर्ष) साधारण चाय बागान पृष्ठभूमि से आते हैं। डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्र आंदोलनों के जरिए उन्होंने अपनी पहचान बनाई। बेरोजगारी, शिक्षा और बुनियादी ढांचे को वे चुनावी बहस के केंद्र में ला रहे हैं। चाय बागान क्षेत्र की युवा बेरोजगारी उनकी प्राथमिकता है।
छात्र राजनीति से मुखर नेता
जुबैर अनाम मजूमदार (34 वर्ष) अल्गापुर-कटलीछेरा से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। यूथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में वे मुखर और आक्रामक युवा नेता के तौर पर उभरे हैं। संगठनात्मक क्षमता, डिजिटल पहुंच और विरोध की राजनीति में उनकी सक्रियता दिखती है। वे युवा मुद्दों पर लगातार आवाज उठाते रहे हैं।
सुरक्षित करियर छोड़ राजनीति में उतरीं डॉक्टर
राइजोर दल ने मरियानी से डॉ. ज्ञानश्री बोरा (34 वर्ष) को टिकट दिया है। रसायनशास्त्र में पीएचडी करने वाली ज्ञानश्री ने कॉलेज की स्थायी नौकरी छोड़ दी। एंटी-सीएए आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद वे राजनीति में आईं। बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाएं और महिलाओं की भागीदारी उनके प्रमुख मुद्दे हैं। सुरक्षित करियर को दांव पर लगाकर वे नई सोच का प्रतीक बन गई हैं।
पहाड़ों से उभरा आदिवासी चेहरा
रुपाली लांगथासा (36 वर्ष) हाफलांग (डीमा हसाओ) से भाजपा की उम्मीदवार हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से पढ़ाई के बाद जिला स्वायत्त परिषद में सक्रिय रहीं। आदिवासी समाज की नई पीढ़ी का वे प्रतिनिधित्व कर रही हैं। क्षेत्रीय विकास और सांस्कृतिक पहचान के संतुलन पर उनका फोकस है। पहाड़ी इलाकों की अनदेखी समस्याओं को वे मुख्यधारा में ला रही हैं।
वैश्विक अनुभव के साथ स्थानीय मुद्दे
असम जातीय परिषद (एजेपी) के टिकट पर सेंट्रल गुवाहाटी से कुनकी चौधरी (26 वर्ष) मैदान में हैं। लंदन से मास्टर्स करने वाली कुनकी कॉरपोरेट करियर छोड़ राजनीति में आई हैं। वे असम की सबसे युवा उम्मीदवारों में शुमार हैं। शिक्षा, कौशल विकास और युवा रोजगार पर उन्होंने काफी काम किया है। वैश्विक नजरिया और स्थानीय मुद्दों का अनोखा मेल उन्हें अलग पहचान दे रहा है।
संगठन से निकला जमीनी चेहरा
भाजपा ने गोलपाड़ा वेस्ट से पवित्र राभा को प्रत्याशी बनाया है। छात्र राजनीति से शुरुआत कर युवा मोर्चा तक पहुंचे पवित्र ने संगठन के जरिए अपनी पहचान बनाई। स्थानीय विकास, रोजगार और ग्रामीण समस्याओं पर उनका एजेंडा केंद्रित है। वे जमीनी स्तर पर काम करने वाले नए चेहरे का उदाहरण हैं।
मध्य वर्ग का प्रतिनिधित्व
कांग्रेस ने तिनसुकिया से डेविड टी. फुकन (देविद फुकन) को टिकट दिया है। प्रबंधन की पढ़ाई के बाद सामाजिक कार्यों से जुड़े फुकन औद्योगिक क्षेत्र, चाय बागान की समस्याएं, शिक्षा, रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर को अपना मुख्य एजेंडा बना रहे हैं। मध्य वर्ग और औद्योगिक क्षेत्र की आवाज वे मजबूती से उठा रहे हैं। ये सभी उम्मीदवार पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर अनुभव और तैयारी के साथ मैदान में हैं। असम में 72 लाख से अधिक युवा मतदाता (18-29 वर्ष) हैं, जिनमें 6.28 लाख पहली बार वोट डालेंगे। पार्टियां इस युवा ऊर्जा को भुनाने की कोशिश कर रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह पीढ़ीगत बदलाव असम की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। जहां पहले परिवारवाद हावी था, वहां अब योग्यता और जमीनी संघर्ष वाले चेहरे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि चुनौती भी कम नहीं है। इन नए चेहरों को स्थापित नेताओं और पुरानी राजनीतिक मशीनरी से मुकाबला करना होगा। चुनावी मैदान में ये युवा उम्मीदवार न सिर्फ अपनी पार्टियों के लिए नई उम्मीद जगा रहे हैं, बल्कि पूरे असम को संदेश दे रहे हैं कि राजनीति अब आम युवा के लिए भी संभव है। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदिवासी अधिकार और कौशल विकास जैसे मुद्दों पर उनकी आवाज असम के भविष्य को आकार देगी। 9 अप्रैल को जब मतदान होगा, तो ये नए चेहरे न सिर्फ वोट मांगेंगे, बल्कि असम की राजनीति में एक नई क्रांति की नींव भी रखेंगे। विरासत की राजनीति धीरे-धीरे पीछे छूट रही है और योग्यता का नया सूरज उग रहा है।