1965 की जंग का वो अनसुना किस्साः जब भारत सरकार के केंद्रीय मंत्री का बेटा पाकिस्तानी सेना में था अफसर! खुलासे से मचा था सियासी बवाल, विपक्ष ने मांगा इस्तीफा तो प्रधानमंत्री शास्त्री ने यूं दिया साथ
नई दिल्ली। भारतीय राजनीति के इतिहास में कई ऐसे प्रसंग दर्ज हैं, जो आज भी हैरान कर देते हैं। ऐसा ही एक अनोखा और संवेदनशील अध्याय जुड़ा है आज़ाद हिंद फौज के वीर सेनानी और स्वतंत्र भारत के वरिष्ठ नेता शाहनवाज खान से। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उस समय देश स्तब्ध रह गया, जब यह जानकारी सामने आई कि तत्कालीन केंद्रीय मंत्री शाहनवाज खान का बेटा पाकिस्तानी सेना में एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में भारत के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था। यह मामला संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का विषय बन गया और विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग तेज कर दी।
आजाद हिंद फौज के जांबाज से केंद्रीय मंत्री बनने तक का सफर
शाहनवाज खान का जन्म अविभाजित भारत के रावलपिंडी जिले के मटोर गांव में हुआ था। शुरुआती शिक्षा के बाद वे ब्रिटिश भारतीय सेना में अधिकारी बने, लेकिन उनका जीवन तब ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंचा जब वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए। वे आजाद हिंद फौज में मेजर जनरल बने और उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल रहे, जिन पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने दिल्ली के लाल किले में चर्चित मुकदमा चलाया। यह मुकदमा पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया। बाद में सभी अधिकारियों को रिहा कर दिया गया। देश विभाजन के समय शाहनवाज खान ने पाकिस्तान के बजाय भारत को चुना। हालांकि उनका पूरा परिवार पत्नी, तीन बेटे और तीन बेटियां रावलपिंडी में ही रह गए। भारत आने के बाद उनके राष्ट्रप्रेम और योगदान को देखते हुए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपनी सरकार में रेलवे एवं परिवहन उपमंत्री बनाया। बाद में वे कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों और आयोगों का दायित्व संभालते रहे।
दो दशक तक सत्ता के केंद्र में रहे
शाहनवाज खान ने स्वतंत्र भारत की राजनीति में लंबा सफर तय किया। वे लगभग दो दशकों तक मंत्री पदों पर रहे। नेहरू सरकार में कई जिम्मेदारियां निभाने के बाद वे दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की कैबिनेट में केंद्रीय कृषि मंत्री बने। संसदीय राजनीति में भी उनका प्रभाव उल्लेखनीय रहा। वे मेरठ लोकसभा सीट से चार बार सांसद चुने गए। 1952, 1957, 1962 और 1971 में। स्थानीय लोग आज भी याद करते हैं कि उनके राजनीतिक जीवन के दौरान मेरठ में सांप्रदायिक सौहार्द कायम रहा और बड़े दंगे नहीं हुए।
1965 की जंग और सामने आया चौंकाने वाला सच
सितंबर 1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा, उसी दौरान यह खुलासा हुआ कि शाहनवाज खान का बेटा महमूद नवाज अली पाकिस्तान में रह गया था और वहां सेना में उच्च पद पर तैनात था। युद्ध के दौरान उसकी सक्रिय भूमिका की खबर भारत पहुंची तो राजनीतिक भूचाल आ गया। विपक्ष ने सवाल उठाया कि जिस मंत्री का बेटा दुश्मन देश की सेना में भारत के खिलाफ लड़ रहा हो, वह भारत सरकार में मंत्री कैसे रह सकता है? संसद और मीडिया में उनके इस्तीफे की मांग उठने लगी।
शाहनवाज ने इस्तीफा देने का मन बनाया
बढ़ते राजनीतिक दबाव और सार्वजनिक आलोचना से शाहनवाज खान बेहद व्यथित हो गए। उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने का मन बना लिया। उनका मानना था कि उनके कारण सरकार असहज स्थिति में न आए। लेकिन तभी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ऐसा कदम उठाया, जिसने भारतीय लोकतंत्र में संवेदनशीलता और न्यायप्रियता की मिसाल कायम कर दी।
शास्त्री बोले- इसमें शाहनवाज की क्या गलती?
जब विपक्ष ने प्रधानमंत्री से शाहनवाज खान को हटाने की मांग की, तब लाल बहादुर शास्त्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी व्यक्ति को उसके बेटे के फैसले के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। शास्त्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि शाहनवाज खान ने भारत के लिए अपना सब कुछ न्योछावर किया है। उनका बेटा पाकिस्तान में है, यह उनका व्यक्तिगत पारिवारिक प्रसंग है, न कि देशभक्ति पर सवाल उठाने का आधार। शास्त्री ने साफ कर दिया कि वे शाहनवाज खान का इस्तीफा स्वीकार नहीं करेंगे। उनके इस फैसले ने शाहनवाज खान को नैतिक संबल दिया और विपक्ष की मांग स्वतः शांत हो गई।
शाहरुख खान के परिवार से भी जुड़ा है रिश्ता
शाहनवाज खान का परिवार बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान के परिवार से भी जुड़ा रहा। शाहरुख की मां लतीफ फातिमा को शाहनवाज खान ने गोद लिया था। बाद में उन्होंने ही उनकी शादी शाहरुख खान के पिता से कराई। यह संबंध भी इतिहास के उस दौर की कहानी कहता है, जब विभाजन की त्रासदी के बीच रिश्तों ने सीमाओं को पार किया था।
देशभक्ति की मिसाल बन गए शाहनवाज
शाहनवाज खान का जीवन इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रभक्ति केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से सिद्ध होती है। एक ओर उनका बेटा पाकिस्तान की सेना में था, तो दूसरी ओर शाहनवाज खान भारत की सेवा में समर्पित रहे। 1965 का यह प्रसंग भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं की निष्पक्षता का जीवंत उदाहरण है, जिन्होंने परिस्थितियों के बजाय व्यक्ति के योगदान को महत्व दिया। आज भी शाहनवाज खान का नाम स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रनिष्ठा और राजनीतिक मर्यादा के प्रतीक के रूप में सम्मान से लिया जाता है।