सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बीच हाईकोर्ट शिफ्टिंग पर नैनीताल में अधिवक्ताओं का विरोध! बोले - पहाड़ के विकास के लिए बना था हाईकोर्ट, मैदान में भेजने के लिए नहीं,राष्ट्रपति की अधिसूचना के बिना नहीं हो सकता स्थानांतरण
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट के संभावित स्थानांतरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के बाद जहां एक ओर कुछ अधिवक्ताओं ने इसे सकारात्मक कदम बताया, वहीं दूसरी ओर नैनीताल में इसका विरोध तेज हो गया है। बुधवार को हाईकोर्ट बार एसोसिएशन सभागार में अधिवक्ताओं की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट को नैनीताल से स्थानांतरित किए जाने के प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया। वक्ताओं ने इसे केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि संवैधानिक, कानूनी और उत्तराखंड राज्य आंदोलन की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा बताया।
बैठक में अधिवक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड हाईकोर्ट एक संवैधानिक संस्था है और इसे किसी प्रशासनिक आदेश के आधार पर नैनीताल से अन्यत्र स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। अधिवक्ता रमन साह का कहना था कि यह कोई जिला कोर्ट नहीं है, जिसका स्थान सामान्य प्रशासनिक आदेश से बदला जा सके। हाईकोर्ट के स्थानांतरण के लिए भारत के राष्ट्रपति की ओर से संवैधानिक प्रक्रिया के तहत अधिसूचना जारी होना अनिवार्य है।
अधिवक्ताओं ने वर्ष 2000 में उत्तराखंड गठन के समय जारी अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा कि उसमें स्पष्ट रूप से हाईकोर्ट का स्थान नैनीताल निर्धारित किया गया है। जब तक राष्ट्रपति उस अधिसूचना में संशोधन नहीं करते, तब तक न राज्य सरकार और न ही हाईकोर्ट प्रशासन अपने स्तर पर इसका स्थानांतरण कर सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में संविधान और राष्ट्रपति की अधिसूचना के अनुरूप कोई निर्णय लिया जाता है तो उन्हें उससे आपत्ति नहीं होगी, लेकिन कानून और संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार कर किसी भी प्रकार की शिफ्टिंग स्वीकार्य नहीं होगी।
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं, बल्कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन की भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है। उनका कहना था कि अलग उत्तराखंड राज्य की मांग के दौरान नैनीताल में हाईकोर्ट स्थापित करने का प्रश्न प्रमुख मुद्दों में शामिल था। आंदोलनकारियों के लंबे संघर्ष और केंद्र सरकार को दिए गए प्रतिनिधित्व के बाद ही नैनीताल को स्थायी हाईकोर्ट का दर्जा मिला था, इसलिए इसे इतनी आसानी से कहीं और स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने स्वयं को 1994 के उत्तराखंड राज्य आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता और आमरण अनशनकारी बताते हुए कहा कि अलग राज्य की मांग इसलिए उठाई गई थी ताकि पर्वतीय क्षेत्रों का विकास हो, बेहतर सड़कें बनें, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं मजबूत हों। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड गठन के समय यह स्पष्ट किया गया था कि नैनीताल में स्थायी हाईकोर्ट रहेगा, जबकि स्थायी राजधानी का निर्णय भविष्य के लिए छोड़ा गया था।
अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि पिछले 25 वर्षों में कई लोग हाईकोर्ट के कारण नैनीताल में स्थापित हुए, आर्थिक रूप से समृद्ध बने और बड़े पदों तक पहुंचे। अब वही लोग अधिक सुविधाओं और बेहतर जीवनशैली का तर्क देकर हाईकोर्ट को मैदान में ले जाने की पैरवी कर रहे हैं।
वही अधिवक्ता दुर्गा सिंह मेहता ने कहा कि हाईकोर्ट पर्वतीय राज्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर नैनीताल में स्थापित किया गया था। यदि न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं के लिए अतिरिक्त सुविधाओं की आवश्यकता है तो उनका विकास नैनीताल में किया जाना चाहिए, न कि संस्थान को पहाड़ से मैदान में स्थानांतरित किया जाए।
एक अन्य अधिवक्ता ने कहा, हमने अलग उत्तराखंड इसलिए नहीं मांगा था कि संस्थानों को पहाड़ों से मैदान में भेज दिया जाए। यदि पहाड़ों में सुविधाओं की कमी है तो उन्हें विकसित किया जाना चाहिए, न कि एक-एक करके प्रमुख संस्थानों को मैदान में स्थानांतरित किया जाए।"
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पहले जिस भवन में आज हाईकोर्ट संचालित हो रहा है, वहां अस्पताल था और उस समय डॉक्टरों की कमी नहीं थी। समय के साथ नैनीताल की आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने के बजाय उन्हें उपेक्षित किया गया और अब उन्हीं कमियों को आधार बनाकर हाईकोर्ट स्थानांतरण की बात की जा रही है।
अधिवक्ताओं का कहना था कि यदि मैदान में अधिक सुविधाएं उपलब्ध हैं तो उनका लाभ केवल न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं तक सीमित रहेगा, जबकि हाईकोर्ट की स्थापना का उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों की जनता को सुलभ न्याय उपलब्ध कराना था। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट किसी व्यक्ति के ऐशो-आराम के लिए नहीं, बल्कि जनता के हितों की रक्षा के लिए स्थापित किया गया है।
आपको बता दें कि कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में व्यावहारिक समाधान अपनाने की बात कहते हुए निर्देश दिया है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट और राज्य सरकार प्रशासनिक स्तर पर आपसी समन्वय के साथ इस विवाद का समाधान निकालें। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हल्द्वानी में हाईकोर्ट के नए परिसर के लिए भूमि चिन्हित की जा चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि चिन्हित भूमि से संबंधित सभी आवश्यक मंजूरियां और अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) छह सप्ताह के भीतर पूरे किए जाएं। इसके बाद भूमि हाईकोर्ट प्रशासन को सौंपकर नए परिसर के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों के बीच नैनीताल के अधिवक्ताओं का विरोध अब खुलकर सामने आ गया है। उनका कहना है कि हाईकोर्ट के स्थानांतरण से पहले संवैधानिक प्रक्रिया का पूर्ण पालन होना चाहिए और उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल भावना को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
बैठक में पूर्व अध्यक्ष बार एसोसिएशन दुर्गा सिंह मेहता , रमन साह,पूर्व सचिव त्रिभुवन फर्त्याल, वरिष्ठ अधिवक्ता वीपी नौटियाल, पुष्पा जोशी,नवीन जोशी, डॉ. कार्तिकेय हरि गुप्ता, नवनीश नेगी, कौशल साह जगाती, भुवनेश जोशी, योगेश पचौलिया, मीना बिष्ट, पल्लवी बहुगुणा, मधु नेगी सामंत, अविदित नौलियाल, निरंजन साह, शिवानंद भट्ट, अमनजोत सिंह, गीता परिहार, दीपा आर्या, सैय्यद काशिफ जाफ़री,विजय लक्ष्मी फर्त्याल सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता उपस्थित रहे।