Oct 21, 2026 Login
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श्मशान भूमि पर 'मौत के सौदे': नेताओं के संरक्षण में स्वयंभू सेवादार का काला खेल, एक मृतक के जारी किए दो-दो प्रमाण पत्र

'Deals with Death' at the Crematorium: The Shady Racket of a Self-Styled Caretaker Under Political Patronage—Two Separate Certificates Issued for a Single Deceased Person

रुद्रपुर। राजनीति जब आस्था, सेवा और संवेदनाओं का सौदा करने लगे, तो समाज की नैतिकता का अंतिम संस्कार होना तय हो जाता है। रुद्रपुर के ट्रांजिट कैंप शिवनगर स्थित मोक्ष धाम (श्मशान घाट) में हाल ही में सामने आया कारनामा सिर्फ एक वित्तीय धोखाधड़ी नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक और राजनीतिक सड़न का प्रमाण है जिसने इंसान की मौत को भी कमाई का जरिया बना दिया है।

जानकारी के अनुसार ट्रांजिट कैंप के शिवनगर स्थित मोक्ष धाम में एक मृतक के नाम पर कथित तौर पर दो अलग-अलग प्रमाण पत्र जारी किए जाने का मामला सामने आया है। इन प्रमाण पत्रों के आधार पर नगर निगम रुद्रपुर में मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए आवेदन किए जाने की जानकारी सामने आने के बाद पूरे प्रकरण ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है, तो प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया और कथित आर्थिक लेनदेन से जुड़े तथ्यों का खुलासा हो सकता है। सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, ट्रांजिट कैंप शिवनगर स्थित श्मशान घाट से एक ही मृतक व्यक्ति के नाम पर दो अलग-अलग दाह-संस्कार प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए। यह खेल इतनी सफाई और बेखौफ अंदाज में खेला गया कि रजिस्टर के क्रम संख्या 234 और 235 से एक ही नाम के दो पर्चे काट दिए गए। जब ये दोनों प्रमाण पत्र नगर निगम रुद्रपुर में अंतिम मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए पहुंचे, तो वहां तैनात चौकस अधिकारियों की नजर इस पर पड़ी। इसके बाद इस पूरे फर्जीवाड़े और लाखों रुपये की बंदरबांट की परतें उधड़ने लगीं। निगम अधिकारियों ने इस गंदे खेल पर कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित स्वयंभू सेवादार की जमकर क्लास लगाई और अब मामला जल्द ही उच्च प्रशासनिक स्तर पर शिकायत के रूप में जाने वाला है।

वही सच्चाई यह है कि इस स्वयंभू सेवादार को कांग्रेस और भाजपा के स्थानीय बड़े नेताओं के सीधे राजनीतिक दबाव के चलते निर्विरोध 'सेवादार' की कुर्सी पर बिठाया गया था। यह वही व्यक्ति है, जिस पर पहले भी सार्वजनिक पूजा कमेटी के धन के गबन का गंभीर आरोप लग चुका था। जिस व्यक्ति का समाज से बहिष्कार होना चाहिए था, उसे क्षेत्र के दिग्गज नेताओं ने राजनीतिक शह देकर एक सार्वजनिक स्थल का 'सर्वेसर्वा' बना दिया। राजनीतिक संरक्षण मिलते ही इस स्वयंभू सेवादार ने मोक्ष धाम पर अपना आधिपत्य जमा लिया और सेवा के आवरण में लूट का खुला खेल शुरू कर दिया। सवाल यह है कि आखिर क्या मजबूरी थी कि सत्ता और विपक्ष दोनों दलों के नेताओं ने मिलकर एक दागी और विवादित चेहरे को इस पवित्र जिम्मेदारी से नवाजा? एक ही व्यक्ति के नाम पर कथित लेनदेन करके दो-दो प्रमाण पत्र जारी करना केवल एक रसीद काटने का मामला नहीं है। इसके पीछे लाखों रुपये की बंदरबांट, फर्जी बीमा क्लेम, या अवैध संपत्ति हड़पने जैसी बड़ी आपराधिक साजिशों की बू आ रही है। अगर इस पूरे मामले की निष्पक्षता और गहराई से जांच की जाए, तो पैसे के लेनदेन का यह सिंडिकेट पूरी तरह से बेनकाब हो जाएगा। साथ ही, उस सेवादार के कई ऐसे काले कारनामों के राज भी सार्वजनिक होंगे, जिन्हें अब तक राजनीतिक छतरी के नीचे छिपाकर रखा गया था। वही यह मामला सिर्फ एक सेवादार की 'काली करतूत' तक सीमित नहीं है, बल्कि उन नेताओं की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए जिनके दबाव और सिफारिश पर इसे यह जगह सौंपी गई थी। या फिर उन राजनीतिक आकाओं को भी कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए जिन्होंने समाज में लूट मचाने के लिए ऐसे लोगों को संरक्षण दे रखा है? क्षेत्र की जनता अब जवाब मांग रही है। मोक्ष धाम जैसे संवेदनशील और पवित्र स्थल पर संवेदनाओं की नीलामी करने वालों और उन्हें शह देने वाले राजनेताओं के खिलाफ सख्त से सख्त दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए,ताकि सार्वजनिक स्थलों की गरिमा और निष्पक्षता बहाल हो सके।