नैनीताल:RTI पर हाईकोर्ट सख्त,राज्य हित का हवाला देकर सूचना नहीं रोक सकती सरकार, केवल कोर्ट द्वारा रोकी गई जानकारी ही हो सकती है गोपनीय,लिंक में पढ़ें क्या है पूरा मामला
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से जुड़े चर्चित मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने राज्य सरकार की उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पूर्व कॉर्बेट पार्क निदेशक और वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी राहुल को विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराने के राज्य सूचना आयोग के आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ में हुई। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद स्पष्ट किया कि सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) की धारा 8 के तहत केवल वही सूचना अपवर्जित मानी जा सकती है, जिसे किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा स्पष्ट रूप से प्रकाशित करने से रोका गया हो या जिसका खुलासा न्यायालय की अवमानना का कारण बन सकता हो। कोर्ट ने पाया कि राहुल द्वारा मांगी गई जानकारी इस श्रेणी में नहीं आती है, इसलिए इसे उपलब्ध कराने से इनकार नहीं किया जा सकता।
दरअसल, कॉर्बेट पार्क के पूर्व निदेशक राहुल के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही है। इस कार्रवाई से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए उन्होंने अप्रैल 2025 में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन दायर किया था। उन्होंने पाखरो टाइगर सफारी और कालागढ़ वन प्रभाग से जुड़े वर्ष 2022 से अब तक की फाइलों और नोटशीट की प्रतिलिपियां मांगी थीं, जो उनके खिलाफ चल रही विभागीय जांच से संबंधित थीं।
हालांकि, वन विभाग के लोक सूचना अधिकारी ने 24 अप्रैल 2025 को यह कहते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया था कि यह जानकारी RTI की धारा 8(1)(बी) के तहत अपवर्जित श्रेणी में आती है। इसके बाद प्रथम अपील में भी यही निर्णय बरकरार रखा गया। मामले में राहुल ने द्वितीय अपील दायर की, जिस पर राज्य सूचना आयोग ने सुनवाई करते हुए 27 अक्टूबर 2025 को वन विभाग को सात दिन के भीतर मांगी गई सूचना उपलब्ध कराने का आदेश दिया। आयोग ने राज्य सरकार के तर्कों को असंगत मानते हुए पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी।
राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। सरकार की ओर से दलील दी गई कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है और विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेज साझा करना राज्य हित के खिलाफ हो सकता है। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि संबंधित अधिकारी चार्जशीट का जवाब दे चुके हैं, इसलिए सूचना उपलब्ध कराना आवश्यक नहीं है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि केवल ‘राज्य हित’ का हवाला देकर सूचना को रोका नहीं जा सकता, जब तक कि वह स्पष्ट रूप से गोपनीय या न्यायालय द्वारा प्रतिबंधित श्रेणी में न आती हो। अदालत ने यह भी कहा कि पारदर्शिता और सूचना का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना का हिस्सा है।
कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करते हुए राज्य सूचना आयोग के आदेश को बरकरार रखा। इस फैसले के बाद अब वन विभाग को निर्धारित समय सीमा के भीतर पूर्व निदेशक राहुल को विभागीय जांच से संबंधित सभी अभिलेख और दस्तावेज उपलब्ध कराने होंगे।
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला सूचना के अधिकार कानून के दायरे और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट संकेत गया है कि विभागीय जांच से जुड़े दस्तावेजों को मनमाने तरीके से गोपनीय बताकर रोका नहीं जा सकता।