Oct 21, 2026 Login
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'13 बच्चे गंगा का भोग बने' - दैनिक भास्कर की यह हेडलाइन खबर नहीं, पत्रकारिता की संवेदना की मौत है

What kind of rhetoric is this about death? Dainik Bhaskar is under fire for describing the tragedy of 13 innocent people as "Ganga's Bhog."where is the sensitivity in its journalism?

पटना। वैशाली के राघोपुर में गंगा के ढाब में नाव पलटने से 13 मासूम बच्चों की मौत हो गई। सात तो एक ही परिवार की बच्चियां थीं। पूरा बिहार रो रहा है। एक माँ अपने मृतक बच्चे के शव से लिपट कर चीख रही है, वो तस्वीर पहले पन्ने पर है। और उसी तस्वीर के ऊपर दैनिक भास्कर ने जो शीर्षक लगाया है, वह है - "नाव पलटी: भोज में जा रहे 13 बच्चे गंगा का भोग बने"

क्या माँ गंगा का आहार बच्चों की लाशें हैं? क्या बच्चे डूबते हैं तो गंगा का पेट भरता है? पत्रकारिता के दृष्टिकोण से सच कहें तो ये हेडलाइन नहीं, दोहरी हत्या है। जी हाँ भास्कर ने एक ही हेडलाइन में दो अपराध किए हैं। पहला, उसने हिंदू आस्था का मजाक उड़ाया। जिस गंगा को हम 'माँ गंगा' कहते हैं, क्या कोई माँ अपने बच्चों को 'भोग' में लेती है? नवरात्र में जब पूरा देश माँ की आराधना कर रहा है, तब माँ गंगा को ही बच्चों की मौत का जिम्मेदार और भक्षक बता देना, ये कौन सी पत्रकारिता है?

दूसरा, उन 13 बच्चों के माँ-बाप की छाती पर कील ठोंकना। जिस माँ ने अपनी बच्ची खोई है, वह जब यह पढ़ेगी कि उसकी बच्ची 'भोग बन गई', उस पर क्या बीतेगी? पत्रकारिता का पहला नियम है कि पीड़ित के प्रति संवेदनशीलता दिखाई जाए। यहाँ तो पीड़ित की चीख को ही साहित्यिक चटनी बनाकर परोसा गया है। लीड खबर की हेडिंग सीधी, सपाट और तथ्यपरक होनी चाहिए,यह पत्रकारिता के पाठ्यपुस्तक का पहला अध्याय कहता है। लेकिन इस खबर में हेडिंग ही दिल चीरने वाली लिखी गई है। भोज में जा रहे 13 बच्चों की नाव पलटने से मौत! अगर इतना भी लिखते तो भास्कर को क्या समस्या थी?

आजकल संपादकों में साहित्यिक विद्वता दिखाने की होड़ लगी है। 'गंगा का भोग', 'काल का ग्रास', 'मौत की लहर'  ये शब्द भीतर के फीचर पन्नों के लिए हैं, लीड की लाशों पर नहीं। जब 13 मृतक शरीर पड़े हों, वहाँ कविता या ऐसे शीर्षक नहीं,बल्कि संवेदनशील हैडिंग होनी चाहिए।
हैरानी की बात है कि यह भूल सिर्फ एक रिपोर्टर की नहीं है। पटना से लेकर रांची, भोपाल, जयपुर तक भास्कर के कई संस्करणों में यही शीर्षक छपा है। इसका मतलब है, डेस्क से लेकर चीफ एडिटर तक किसी ने भी यह नहीं सोचा कि हम क्या लिख रहे हैं। कॉपी-पेस्ट की इस पत्रकारिता में प्रूफ रीडर सिर्फ स्पेलिंग देखता है, संवेदना नहीं।

ये वही 'सच्ची बात, बेधड़क' वाला अखबार है जो एक पार्टी के पक्ष में बेधड़क प्रोपेगेंडा करता है। प्रोपेगेंडा कीजिए, आपका अधिकार है। लेकिन 13 बच्चों की मौत पर तो कम से कम बेधड़क मत बनिए, थोड़ा बेधड़क शर्म कर लीजिए। आज जरूरत है कि प्रेस काउंसिल और पाठक, दोनों इस पर सवाल उठाएं। क्योंकि अगर बच्चों की मौत भी 'भोग' है, तो कल को पत्रकारिता की मौत को क्या कहेंगे?